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सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम

अकादेमी द्वारा 13 जनवरी, 1955 में दिल्ली में पहली बार कनाडा की कलाकृतियों की एक प्रदर्शनी लगाई गई। बाद में इस प्रदर्शनी को कोलकाता, चेन्नई और मुम्बई में भी आयोजित किया गया। इसके बाद फरवरी में चीनी हस्तशिल्प की एक प्रदर्शनी और मार्च में हंगरी लोक कलाओं की प्रदर्शनी आयोजित की गई। ललित कला अकादेमी द्वारा आयोजित बड़ी प्रदर्शनियों में से एक यूनेस्को प्रदर्शनी थी। यूनेस्को कला प्रदर्शनी ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कला के उत्तरोत्तर अनुभव और ज्ञान में बड़ा योगदान दिया और कलाकारों तथा कलाप्रेमियों को विश्व की श्रेष्ठतम कलाकृतियों से परिचित होने का अवसर भी दिया। अकादेमी ने राष्ट्रीय आयोग के माध्यम से इन प्रदर्शनियों को संचालित किया।

वर्ष 1958 में अकादेमी ने नीदरलैंड दूतावास के साथ मिलकर एक प्रदर्शनी ‘‘हू वाज़ रेमब्रैंड’’ का आयोजन किया। इस चल प्रदर्शनी का आयोजन अहमदाबाद, बड़ौदा, दिल्ली, अमृतसर, लखनऊ, पटना और कोलकाता में भी किया गया। रेम्ब्रैंड और डच कला पर फिल्में भी दिखाई गईं। यूगोस्लाव समकालीन काष्ठकला और ग्राफिक कला और चैकोस्लोवाकिया ग्लास पर भी प्रदर्शनियाँ आयोजित की गईं।

वर्ष 1965 से अकादेमी ने अपनी प्रदर्शनियों में छायाचित्र, ग्राफिक वास्तुशिल्प, चित्रकला, मूर्तिशिल्प आदि सभी माध्यमों को शामिल किया। पॉलिश समकालीन ग्राफिक कला, रोमानियाई वास्तुशिल्प, भारत और मैक्सिको पर टी कुलसीविक की कृतियाँ, फ्राँसीसी अंलकृत कला आदि प्रदर्शनियों को काफी सराहा गया। अकादेमी ने प्रथम मलय प्रदर्शनी वर्ष 1963 में आयोजित की। तब तक पोट्रेट ऑफ मैक्सिको सबसे बड़ी आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी थी जिसमें मैक्सिको की मायन, ऑलमेक, मिक्सटोक और एस्टेक सभ्यताओं की कलाओं, मैक्सिको के 3000 से ज्यादा बौद्ध मठों, चर्चों, बैरक की कलाओं से लेकर आधुनिक काल के ग्राफिक चित्रों तक को शामिल किया गया था।  

वर्ष 1965 के बाद से अकादेमी के सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रदर्शनियों का आयोजन बारम्बार किया जाने लगा। कला के पाराखी समकालीन आस्ट्रिलाई पेंन्टिग, आस्ट्रेलियाई आदिवासी कला, हेनरी कारटियर, लियोनार्दो द विन्सी, विएना यर्थाथवादी स्कूल, एस्टोनिया, लिथुआनिया, लाटविया की कला से लोग परिचित होने लगे।

वर्ष 1987 से, लोवर के 61 ग्राफिक प्रिन्टों के अलावा, स्टीवन डोमा द्वारा ललित कलाओं पर मनोवैज्ञानिक शोध पर चित्रों की यूनेस्को की प्रदर्शनी भी लगाई गई। वर्ष 1988 प्रदर्शनियों की दृष्टि से काफी लाभकार रहा। मार्क रिबाउन्ड के छायाचित्र, जार्ज विलियम द्वारा मूर्तिशिल्पों, निकदई रोरिख के चित्रों, मैक्स क्लिंगर के ग्राफिक, बुल्गारियाई महिला कलाकारों की कृतियों की प्रदर्शनी का आयोजन इसी वर्ष में किया गया।

वर्ष 1990 में देश के कुछ वरिष्ठ कलाकारों की कृतियों के साथ-साथ वैन गॉग के छायाचित्र भी प्रदर्शित किए गए। 1992 में वैन गॉग के प्रिन्टों की प्रदर्शनी लगाई गईं।

मिशेल बावेट के 75 मौलिक पोस्टरों की प्रदर्शनी ‘‘लाँग लीव द पोस्टर’’ का आयोजन 23 अक्तूबर 1991 को किया गया। जापान फाउण्डेशन ने अकादेमी के साथ मिलकर 11 नवम्बर, 1994 को जापानी पतंगों की प्रदर्शनी आयोजित की। अकादेमी में चीनी राष्ट्रपति के दौरे के दौरान चीन के वाद्ययंत्रों और कला रूपों की प्रदर्शनी रवीन्द्र भवन में वर्ष 2005 में आयोजित की गईं। वर्ष 2009 में किरोन ग्रन्थागार से अभिव्यंजनावादी, ज्यामितिय और अतियर्थाथवादी कलारूपों की मैक्सिकन प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।

विदेश भेजी गई प्रदर्शनियाँ

विदेश भेजी जाने वाली पहली भारतीय प्रदर्शनी पूर्वी यूरोपीय देशों और भारत सरकार के मध्य विवेचना का परिणाम थी। इस प्रदर्शनी में प्राचीन चित्र, मूर्तिशिल्प समकालीन भारतीय कलाकारों के प्राचीन चित्र, मूर्तिशिल्प शामिल थे। श्री बी.सी.सान्याल और श्री एच.ए. गदे के संयोजन में प्रदर्शनी चेकोस्लोवाकिया, हँगरी, बुल्गारिया और मॉस्को में आयोजित की गई।

इसके अलावा अकादेमी ने यूगोस्लाविया में ग्राफिक कला प्रदर्शनी, पेरिस द्विवार्षिकी, वेनिस द्विवार्षिकी, साओपोलो द्विवार्षिकी, टोक्यो द्विवार्षिकी, फ्लोरेन्स द्विवार्षिकी, कैरो द्विवार्षिकी, अन्तर्राष्ट्रीय कला संगोष्ठी, हंगरी आदि में भाग लिया। अकादेमी के निजी संग्रह में से चयनित कलाकृतियाँ कई देशों में प्रदर्शित की गईं। इनमें सितम्बर 1991 में सेशेल्स में आयोजित और 2002 में आदिस अबाबा में आयोजित प्रदर्शनियाँ शामिल हैं। बांग्लादेश, साईप्रस, मॉरीशस में नियमित रूप से अकादेमी की कलाकृतियाँ भेजी जाती रही हैं।