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राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी

ललित कला अकादेमी का सर्वाधिक श्रेष्ठ वार्षिक आयोजन राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी है। वर्ष 1955 से आरम्भ यह प्रदर्शनी दृश्य कलाओं में विकास का प्रतिनिधित्व करती है। वर्षों में राष्ट्रीय प्रदर्शनी परिवर्तनों, संशोधनों और फेर-बदल के साथ विकसित हुई है।

वर्ष 1955 में 1200 प्रविष्टियों में से 280 का चयन प्रदर्शनी के लिए किया गया। योग्य कृतियों को रु.1000/- के दस पुरस्कार प्रदान किए गए। वर्ष 1956 के बाद से श्रेष्ठ कलाकृति को अकादेमी के स्वर्ण फलक से सम्मानित किया जाने लगा और कुछ चयनित शहरों में प्रदर्शनी प्रदर्शित करने का निर्णय भी लिया गया। इसी क्रम में छः दशकों के दौरान राष्ट्रीय प्रदर्शनी कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई, जयपुर, अमृतसर, लखनऊ, गुवाहाटी, पटना, हैदराबाद, गोआ और चण्डीगढ़ आदि जगहों पर आयोजित की जा चुकी है।

वर्ष 1958 से कलाकृतियों की बिक्री अकादेमी के सख्त निरीक्षण के तहत की जाने लगीं। राष्ट्रीय आधुनिक कला दीर्घा ने अपने स्थायी संग्रह के लिए कलाकृतियाँ खरीदीं। वर्ष 1959, राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी के पाँचवें वर्ष में कलाकृतियों को तीन श्रेणियों (आधुनिक, प्राचीन और यथार्थवादी) में विभाजित किया गया। परन्तु वर्ष 1960 में राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी को पुनः उसके रूप में वापिस स्थापित कर दिया गया। वर्ष 1962 में इंग्लैड की महारानी ने राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में गहरी रूचि दिखाते हुए दो पेंन्टिग खरीदीं। वर्ष 1963 में राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी की लोकप्रियता काफी बढ़ गई थी। लगभग 6000 लोगों ने प्रदर्शनी देखी।

वर्ष 1964 से 1967 तक अकादेमी ने श्रेष्ठतम कलाकृतियों को प्रतिष्ठित स्वर्ण फलक देने का क्रम जारी रखा।

उत्तर-प्रदेश राज्य ललित कला अकादेमी ने राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी की मेज़बानी कीं। अकादेमी में अन्य प्रदर्शनियों के आयोजन के कारण पहली बार प्रदर्शनी का आयोजन राष्ट्रीय राजधानी से बाहर किया गया। ऐसा पहली बार 1971 में हुआ जब मध्य प्रदेश कला परिषद् के सहयोग में भोपाल में राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी का आयोजन किया गया और वर्ष 1978 में इसका आयोजन अहमदाबाद में और 1986 में एकेडमी ऑफ फाईन आर्ट्स, कोलकाता में किया गया।

19वीं कला प्रदर्शनी में आर.एस. बार्थलोमियो को आयुक्त नियुक्त किया गया। उसी समय महत्वपूर्ण कला प्राधिकारियों और कला संयोजकों ने भी अपना योगदान दिया। इसी वर्ष पुरस्कार की राशि बढ़ाकर रु.5000/- कर दी गई। वर्ष 1986 में इस प्रदर्शनी में ‘आमन्त्रित कलाकार’ शीर्षक से नया भाग जोड़ा गया जिसके अन्तर्गत विनोद राय पटेल, बाबू राव सादवलेकर, रामगोपाल विजयवर्गीय और अन्य की कलाकृतियों को प्रदर्शित किया गया और पुरस्कार राशि बढ़ाकर रु.10,000/- कर दी गई। वर्ष 2001 में 43वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी का आयोजन कर्नाटक चित्रकला परिषद, बंगलौर में किया गया। पुरस्कार राशि बढ़ाकर रु. 25000/- की गई जिसे बाद में वर्ष 2002 में रु. 40,000/-तक बढ़ा दिया गया।

कोची में आयोजित 46 वीं राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी महत्वपूर्ण रही क्योंकि इस वर्ष निर्णायक मण्डल दो स्तरों पर स्थापित किया गया। प्रथम स्तरीय निर्णायक मण्डल ने हजारों प्रविष्टियों में प्रारम्भिक चयन किए और द्विस्तरीय निर्णायक मण्डल ने पुरस्कार हेतु कृतियों का चयन किया जिन्हें रु. 50,000/- का पुरस्कार, एक स्मार चिह्न और एक फलक-पत्र प्रदान किया गया।

वर्ष 2006 से राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी आयोजन में सांस्कृतिक प्रदर्शनों को भी शामिल किया जाने लगा और यह परम्परा आज तक जारी है। अकादेमी ने कलाकृति माध्यमों की श्रंखला में ग्राफिक कला के तहत डिजीटल फोटोग्राफी को भी जोड़ा।